घोटाला: सेटिंग से बेचा 90 लाख का सामान।भुगतान को सूखी जान

बिना कोटेशन ही ठूंस डाला 90 लाख का सामान।अब फंसा भुगतान उत्तराखंण्ड आयुर्वेद विश्विद्यालय में जो न हो जाये वो कम है। विश्वविद्यालय ने आनन फानन में कॉलेज खोलने के चक्कर मे मेसर्स ऋषभ इंटरप्राइजेज को बिना कोटेशन औऱ आडर निर्गत किये ही तकरीबन 90 लाख रुपये का सामान विश्विद्यालय को आपूर्ति करने का मौखिक […]

बिना कोटेशन ही ठूंस डाला 90 लाख का सामान।अब फंसा भुगतान

उत्तराखंण्ड आयुर्वेद विश्विद्यालय में जो न हो जाये वो कम है। विश्वविद्यालय ने आनन फानन में कॉलेज खोलने के चक्कर मे मेसर्स ऋषभ इंटरप्राइजेज को बिना कोटेशन औऱ आडर निर्गत किये ही तकरीबन 90 लाख रुपये का सामान विश्विद्यालय को आपूर्ति करने का मौखिक आदेश दिया।

मेसर्स ऋषभ इंटरप्राइजेज ने उक्त सामान की आपूर्ति भी कर दी (बिना लिखित आडर के) यह सोच कि  पेमेंट तो हो ही जायेगा।अब दो साल से यह सामान लावारिश पड़ा है और इंटरप्राइजेज भुगतान के लिए विश्विद्यालय के चक्कर काट रहा है।

इस फर्म द्वारा आपूर्ति किये सामान में ओटी,पैथोलॉजी लेब,गायनी,पीडिया विभागों सहित कई विभागों के उपकरण शामिल हैं।सूत्र बताते हैं कि लाखों रुपये के इन सामानों में से कई सामान दैनिक उपभोग में खप गये। अधिकारियों ने सुध तक नहीं ली कि ये सामान कहाँ से आये।

इस दौरान  दो – तीन कुलपति तथा दो कुलसचिव विश्विविद्यालय से रुखसत हो गए औऱ निजाम भी बदल गया।

अब उक्त एजेंसी के सप्लायर ने अपने पेमेंट के लिए विश्विद्यालय को गुहार लगाई तो नए निजाम ने सप्लाई आदेश मांगा जो सबंधित एजेंसी के पास था ही नही, क्योंकि सेटिंग गेटिंग से बिना कोटेशन उक्त सामान की आपूर्ति की गई।

सूत्रों के अनुसार लाखों रुपये के सामान यूं ही बिना नियम कायदे सप्लाई कर दिये गए।अब उक्त एजेंसी ने जब पेमेंट के लिये दवाब बनाना शुरू किया तो नए निजाम ने पल्ला झाड़ लिया।अब उक्त एजेंसी ने अपना सामान पेमेंट न होने की दशा में वापस ट्रक में भर ले जाने का अल्टीमेटम दिया है।

विश्वविद्यालय के निर्माण का ठेका राजकीय निर्माण निगम को दिया गया था। इस सामान की सप्लाई का बजट भी राजकीय निर्माण निगम के नाम पर पास किया गया था। किंतु इस बीच ऋषभ इंटरप्राइजेज ने ही विश्वविद्यालय के अधिकारियों के कहने पर यह सामान सप्लाई कर दिया। ऋषभ इंटरप्राइजेज के कर्मचारियों का कहना है कि तब सामान का भुगतान राजकीय निर्माण निगम से कराए जाने की बात हुई थी  लेकिन बाद में  सभी कुलपति और कुलसचिव बदल गए तो फिर यह आश्वासन मिला कि इस सामान के लिए औपचारिक  टेंडर कराए जाएंगे।  सूत्रों के अनुसार ऋषभ इंटरप्राइजेज ने बहुत कम दरों का टेंडर भी भरा ताकि उसका टेंडर पास हो जाए और उसकी फंसी रकम निकल जाए। लेकिन यह टेंडर किसी कारणवश कैंसिल हो गया। अब रिशब इंटरप्राइजेज की कोशिश यह है कि या तो दूसरा टेंडर हो जाए अथवा वह अपना सामान उठाकर ले जाएगा।  विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने ऋषभ इंटरप्राइजेज से 10 दिन की मोहलत मांगी है।

विश्वविद्यालय के पूर्व के अधिकारियों का कहना है कि यह ठेका तो राजकीय निर्माण निगम को दिया गया था और सभी सामान की सप्लाई का काम भी निर्माण निगम को ही सौंपा गया था अतः वह किसी ऋषभ इंटरप्राइजेज को नहीं जानते।

जबकि वर्तमान कुलपति अभिमन्यु कुमार ने मुख्यालय से बाहर होने की बात कहते हुए कोई कमेंट देने से मना कर दिया। ऋषभ इंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर पांडे का कहना है कि विश्वविद्यालय ने उनसे भुगतान करने हेतु कुछ समय मांगा है, लिहाजा वह इस मामले पर कुछ नहीं कहना चाहेंगे।

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