पुल की बजाय पिकनिक पर उड़ा रहे सरकारी धन!

चीन  और नेपाल सीमा से घिरे उत्तराखंड में इन दिनों भारतीय सेना की आवाजाही बहुत तेजी से बढ़ी है। यह पहला अवसर है, जब खाली होते पहाड़ों के कारण सेना को आवश्यकता से अधिक मुस्तैदी दिखानी पड़ रही है। उत्तराखंड की डबल इंजन की सरकार पहली वर्षगांठ मनाने से पहले ही जनता के सवालों से […]

चीन  और नेपाल सीमा से घिरे उत्तराखंड में इन दिनों भारतीय सेना की आवाजाही बहुत तेजी से बढ़ी है। यह पहला अवसर है, जब खाली होते पहाड़ों के कारण सेना को आवश्यकता से अधिक मुस्तैदी दिखानी पड़ रही है। उत्तराखंड की डबल इंजन की सरकार पहली वर्षगांठ मनाने से पहले ही जनता के सवालों से बुरी कदर घिर चुकी है। एक साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले 68 लाख रुपए की चाय और 5 करोड़ रुपए हवा में उड़ाने वाली यह सरकार अब पिकनिक को लेकर सवालों के घेरे में है। जिस केदारनाथ को 2019 के चुनाव के लिए वोट बैंक बनाकर वहां कभी केदारपुरी बसाने तो कभी केदारनाथ में पिकनिक का आयोजन हो रहा है।


24 जनवरी 2018 को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह को एक पत्र लिखा, जिसमें 2013 में आई भीषण आपदा के दौरान केदारनाथ विधानसभा की मंदाकिनी और काली गंगा पर बहे पुलों का निर्माण न होने पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया। केदारनाथ विधानसभा के दर्जनों लोग झूला पुलों के अभाव में जान गंवा चुके हैं। कई विद्यार्थी और गर्भवती महिलाएं पुलों के अभाव के कारण स्वर्ग सिधार चुके हैं। लगातार हो रही इन दुर्घटनाओं के बावजूद सरकार द्वारा सकारात्मक रुख अपनाने की बजाय सरकार का ढुलमुल रवैया सोचनीय है।
नवंबर 2017 में स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अगस्त्यमुनिक के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक मंच से केदारनाथ विधानसभा के ध्वस्त पुलों को बनाने का आश्वासन भी दिया, किंतु बात आगे नहीं बढ़ी। केदारनाथ के विधायक मनोज रावत कई बार सरकार को रिमाइंडर भेज चुके हैं, किंतु जिस सरकार के पास रुद्रप्रयाग जनपद के टूटे पुलों के निर्माण के लिए पैसा नहीं है, वह सरकार अब सरकारी धन खर्च कर केदारनाथ में एक पिकनिक कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इससे पहले भारी ठंड के कारण पिकनिक वाले लोग आने से मना कर चुके थे, क्योंकि उन्होंने जीवन में इस तरह की ठंड कभी झेली ही नहीं।
देश के विभिन्न भागों में नौकरी करने वाले उन लोगों को भी सरकारी पिकनिक में बुलाया जा रहा है, जो वर्षों पहले उत्तराखंड छोड़कर चले गए और जिनके परिजन छुट्टियां मनाने भी कभी उत्तराखंड नहीं आते। इस प्रकार के लोगों की सरकारी पिकनिक पर पैसा खर्च करने की बजाय यदि केदारनाथ के गरीब-गुरबों और आपदा पीडि़तों के हित में निर्णय लिए जाते तो निश्चित रूप से बाबा केदार प्रसन्न होते कि जिन लोगों के कारण आज पहाड़ जीवित है, उनके हित में सरकार ने काम किया, न कि सरकारी खर्चे से पिकनिक मनाने वाले लोगों पर। यह दौर समय रहते चेतने का है।

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